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# भाषा (Language): भाषा की परिभाषा, भेद, लिपि | हिन्दी व्याकरण
**作者:吉祥法师**
## 引言
विश्व में हजारों भाषाएँ बोली-समझी जाती हैं, और मानव जीवन में भाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। एक बच्चा जन्म के समय न तो बोल पाता है और न ही दूसरों की बातों को समझ पाता है। धीरे-धीरे वह अपने परिवार के लोगों को बोलते हुए सुनता है, शब्दों को समझने लगता है और फिर उन्हीं शब्दों को दोहराना शुरू कर देता है। इस प्रकार वह उसी भाषा को सीख जाता है जो भाषा वह अपने चारों ओर सुनता है। परंतु यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि बच्चा चाहे बोलना सीख जाता है, लेकिन उसे यह ज्ञान नहीं होता कि भाषा क्या है या भाषा की परिभाषा क्या है। यही प्रक्रिया हम सबके साथ भी घटित होती है। हम सभी बोलना, लिखना और समझना तो जानते हैं, किंतु व्याकरण और भाषा के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं रखते। प्रस्तुत लेख में हम भाषा की परिभाषा, भेद, लिपि तथा बोली आदि की गहन जानकारी प्राप्त करेंगे।
## भाषा क्या है? (What is Language?)
### भाषा की परिभाषा
सामान्य शब्दों में भाषा वह साधन है जिसके द्वारा हम अपने भावों और विचारों को दूसरों के समक्ष प्रकट करते हैं—चाहे वह बोलकर हो या लिखकर। भाषा शब्द संस्कृत की "भाष्" धातु से बना है जिसका अर्थ है "विचार प्रकट करना"। इस प्रकार हम भाषा को यूं भी परिभाषित कर सकते हैं—
भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने मन के विचारों और भावों को दूसरों तक बोलकर या लिखकर पहुँचाता है। वह दूसरों के भावों और बातों को भी समझने में सक्षम होता है। जो चीज़ (माध्यम) के उपयोग से हम अपनी मन की बात को दूसरों तक पहुँचा सकें अथवा दूसरों के विचारों को ग्रहण कर सकें, उसे भाषा कहते हैं।
भाषा को समझने के लिए एक उदाहरण लीजिए—मान लीजिए कि एक भारी वस्तु को हमें मुंबई से गोवा ले जाना है। इसे ले जाने के लिए हमें वाहनों (साधनों) की आवश्यकता होगी। ठीक उसी प्रकार अपने विचारों को दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए भी हमें एक साधन की आवश्यकता होती है और यही साधन भाषा कहलाता है। जिस प्रकार वस्तुओं को ले जाने के लिए बस, ट्रक, ट्रेन या जहाज़ जैसे अनेक विकल्प होते हैं, उसी प्रकार विचारों के आदान-प्रदान के लिए भी हमारे पास कई विकल्प होते हैं।
मानव जीवन के प्रारंभिक काल में आज की तरह भाषा विकसित नहीं थी। आदि मानव अपनी बातों को संकेतों के जरिए अभिव्यक्त करते थे और संकेतों से ही दूसरों की बातों को समझते थे। उस समय न शब्दों का विकास हुआ था और न ही भाषा का। संकेतों में विचारों को समझ पाना अत्यंत कठिन होता था, कभी-कभी तो यह लगभग असंभव हो जाता था। धीरे-धीरे मनुष्य ने शब्दों का निर्माण शुरू किया और वस्तुओं को नाम देना आरंभ किया। इसी क्रम में शब्दों के निर्माण के मेल से भाषा का विकास हुआ।
### भाषा और व्याकरण (Grammar) का संबंध
भाषा और व्याकरण का घनिष्ठ संबंध है। जिस विद्या से हम यह सीखते हैं कि किसी भी भाषा को शुद्ध रूप से लिखना, पढ़ना या बोलना कैसे है, उसे हिंदी में व्याकरण और अंग्रेज़ी में ग्रामर (Grammar) कहते हैं। सरल शब्दों में—जिसके द्वारा हम किसी भाषा को शुद्ध-शुद्ध लिखना, पढ़ना और बोलना सीख जाएं, उसे व्याकरण कहते हैं। व्याकरण के अंतर्गत अनेक विषय आते हैं—जैसे संज्ञा, सर्वनाम, काल, वर्ण विचार, शब्द विचार आदि। हिंदी व्याकरण के पहले अध्याय में भाषा के बारे में विस्तार से चर्चा की जाती है, क्योंकि जब तक हमें यह पता न हो कि भाषा क्या है या व्याकरण पढ़ने का उद्देश्य क्या है, तब तक व्याकरण की अन्य विधाओं को समझ पाना बेहद कठिन होगा।
## भाषा के प्रकार (Types of Language)
जिस प्रकार हमें यात्रा करने के लिए कई विकल्प मौजूद होते हैं—जैसे बस, ट्रक, ट्रेन आदि में से कोई भी साधन चुन सकते हैं—ठीक वैसे ही विचारों के आदान-प्रदान के लिए भी हमारे पास तीन मुख्य विकल्प होते हैं। भाषा के निम्नलिखित तीन प्रकार हैं:
### 1. मौखिक भाषा (Spoken Language)
जब व्यक्ति के विचारों का आदान-प्रदान बोलकर होता है तो वह मौखिक भाषा कहलाती है। सरल शब्दों में कहें तो जब हम अपने विचारों को सामने वाले व्यक्ति के समक्ष बोलकर प्रकट करते हैं और सामने वाला सुनकर उसे ग्रहण करता है, तब वह मौखिक भाषा कहलाती है।
**उदाहरण:** शिक्षक कक्षा में बच्चों को पढ़ाते हैं, छात्र अपने शिक्षक से प्रश्न पूछता है, हम अपने मित्रों से वार्तालाप करते हैं आदि मौखिक भाषा के उदाहरण हैं। कभी-कभी विद्यालयों में मौखिक परीक्षा भी आयोजित की जाती है जिसमें शिक्षक प्रश्न पूछते हैं और छात्रों को बोलकर ही उत्तर देना होता है।
मौखिक भाषा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- इसमें वक्ता और श्रोता दोनों का उपस्थित होना आवश्यक है
- इसमें उच्चारण अथवा ध्वनि का विशेष महत्व होता है
- बोली जाने वाली भाषा काफी हद तक स्थानीय प्रभाव से प्रभावित होती है
### 2. लिखित भाषा (Written Language)
जब विचारों एवं भावों का आदान-प्रदान लिखकर किया जाता है तो वह भाषा लिखित भाषा कहलाती है। मौखिक भाषा के विकसित होने के बाद ही लिखित भाषा अस्तित्व में आई। मौखिक भाषा को लिखित रूप में प्रस्तुत करने के लिए ही लिपि का विकास हुआ।
**उदाहरण:** पत्र लिखना, पुस्तकें लिखना, समाचार-पत्र में लेख लिखना, आदेश पत्र, प्रार्थना-पत्र तैयार करना, ई-मेल भेजना, आदि।
लिखित भाषा की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- यह अधिक स्थायी और सुरक्षित होती है
- इसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है
- इसे किसी भी समय और किसी भी स्थान पर पढ़ा जा सकता है
- लेखक की अनुपस्थिति में भी विचारों का आदान-प्रदान संभव हो जाता है
- इसमें भाषा शुद्ध, परिष्कृत और साहित्यिक होती है
### 3. सांकेतिक भाषा (Sign Language)
जब हम अपने विचारों को शब्दों, ध्वनि या लिपि के माध्यम से नहीं बल्कि शरीर के विभिन्न अंगों (हाव-भाव, संकेत) की सहायता से व्यक्त करते हैं तो उसे सांकेतिक भाषा कहते हैं। यह भाषा विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी होती है जो बोल नहीं सकते (मूक) या सुन नहीं सकते (बधिर)।
**उदाहरण:** सिर हिलाकर हाँ या ना कहना, हाथ से किसी वस्तु की ओर इशारा करना, सिर खुजलाकर सोचने का संकेत देना, चेहरे के भावों से खुशी या गम प्रकट करना, आँखों से किसी बात का संकेत देना, कंधे उचकाना, आदि।
सांकेतिक भाषा विकलांग व्यक्तियों के लिए संचार का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। आधुनिक युग में विश्व के कई देशों में मूक-बधिर लोगों के लिए विशेष सांकेतिक भाषा विकसित की गई है। इसके अतिरिक्त भारतीय संस्कृति में विभिन्न मुद्राओं (हस्त संकेतों) का महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
## भाषा की विशेषताएँ
प्रत्येक भाषा की कुछ मौलिक विशेषताएँ होती हैं जो उसे अन्य भाषाओं से अलग पहचान देती हैं। भाषा के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं:
- भाषा एक सीखी-सिखाई जाने वाली प्रक्रिया है
- मानव भाषा सृजनशील होती है
- भाषा सामाजिक होती है तथा समाज के साथ ही विकसित होती है
- भाषा परिवर्तनशील होती है
- भाषा अनुकरण, अभ्यास तथा अधिगम द्वारा आत्मसात की जाती है
- भाषा में व्यवस्थित, शास्त्रीय और वैज्ञानिक पद्धति होती है
## बोली और भाषा में अंतर
हिंदी व्याकरण में बोली (Dialect) और भाषा के बीच के संबंध को समझना अत्यंत आवश्यक है। बोली का अर्थ होता है किसी विशेष क्षेत्र में बोला जाने वाला मौखिक रूप जो भाषा का ही स्थानीय रूप है। जब कोई भाषा किसी सीमित क्षेत्र में बोली जाती है तो वह बोली कहलाती है, लेकिन जब उसी बोली का विकास होकर उसमें साहित्य का सृजन होने लगता है और वह शुद्ध एवं परिष्कृत होती है तो भाषा बन जाती है।
**मुख्य अंतर:**
- भाषा का क्षेत्र व्यापक होता है जबकि बोली का क्षेत्र सीमित होता है
- बोली मौखिक रूप है जबकि भाषा लिखित रूप भी रखती है
- बोली में साहित्य का निर्माण नहीं होता जबकि भाषा में साहित्य का सृजन होता है
- भाषा में व्याकरण के नियमों की प्रधानता होती है, जबकि बोली व्याकरण के नियमों से मुक्त होती है
- उदाहरण के लिए, अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी आदि हिंदी की बोलियाँ हैं। जिनमें से कुछ जैसे भोजपुरी, मैथिली को अपनी लिपि और साहित्य के कारण अलग भाषा का दर्जा भी दिया गया है
## लिपि क्या है? (What is Script?)
लिपि वह माध्यम है जिसके द्वारा भाषा को लिखित रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सरल शब्दों में कहें तो मौखिक भाषा की ध्वनियों को जिन चिह्नों द्वारा लिखित रूप में प्रकट किया जाता है, उन्हीं चिह्नों के समूह को लिपि कहा जाता है। भाषा को लिखने के लिए उचित लिपि सबसे पहले ध्वनियों की पहचान और उन्हें व्यवस्थित करने में सहायता करती है।
हिंदी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। यह विश्व की सबसे वैज्ञानिक और व्यवस्थित लिपियों में से एक है, क्योंकि इसमें जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा भी जाता है। हिंदी के अलावा संस्कृत, मराठी, नेपाली आदि कई भाषाएँ देवनागरी लिपि को अपनाती हैं। देवनागरी लिपि में वर्णमाला विभिन्न वर्गों में विभाजित होती है—स्वर, व्यंजन और संयुक्ताक्षर। हिंदी भाषा में 11 स्वर और 33 व्यंजन हैं। इसके अलावा अनुस्वार, विसर्ग, चंद्रबिंदु जैसे अनेक उच्चारण चिह्न भी इस लिपि में सम्मिलित हैं। हर भाषा की अपनी अलग लिपि होती है, जैसे अंग्रेज़ी की रोमन लिपि, अरबी की अरबी लिपि, उर्दू की नस्तालीक लिपि आदि।
लिपि के अनेक लाभ हैं—लिखित भाषा सुरक्षित रहती है और लंबे समय तक संरक्षित रखी जा सकती है। पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं अथवा दस्तावेजों के माध्यम से मौखिक विचारों को पीढ़ी दर पीढ़ी संप्रेषित किया जा सकता है। मौखिक भाषा में प्रेषक और ग्राहक का साक्षात्कार आवश्यक है, जबकि लिपि का उपयोग करने से यह आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
## निष्कर्ष
भाषा मानव की अभिव्यक्ति का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। यह हमें अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को दूसरों तक पहुँचाने का अवसर देती है। मौखिक, लिखित और सांकेतिक—तीन विधाओं में विभाजित, भाषा मानवीय संचार के मूल आधार हैं। मौखिक भाषा बोलकर विचारों का आदान-प्रदान करती है तो लिखित भाषा लिखकर संदेशों को स्थायित्व देती है। वहीं, सांकेतिक भाषा उन लोगों के लिए संचार का सशक्त माध्यम है, जिनके लिए बोलना या सुनना संभव नहीं है। भाषा व्याकरण से अलग नहीं, बल्कि व्याकरण भाषा की शुद्धता सिखाने वाली विद्या है। जब तक हमें भाषा के मूल स्वरूप का ज्ञान नहीं होगा, व्याकरण के नियमों को समझना कठिन प्रतीत होगा। इस प्रकार हिंदी व्याकरण की यात्रा भाषा को समझने से ही प्रारंभ होती है। अतः भाषा, व्याकरण, लिपि तथा बोली का समग्र ज्ञान केवल परीक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी भाषाई क्षमता को संवारने और शोधित करने के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।